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फलित ज्योतिष पाखंड से जयादा कुछ नहीं है?

भारतवर्ष को अवनति के गढ़े में छकेलने वाला दूसरा बहुत बड़ा कारण है-फलित ज्योतिष। यह फलित ज्योतिष कई भागों में विभक्त है,यथा मुहूर्त्त,नवग्रह पूजा और दिशाशूल।

वैदिक साहित्य में ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण स्थान है। ज्योतिष को वेद के षड़अङ्गों में से एक माना गया है। वेदों में बहुत से ऐसे मन्त्र विद्यमान हैं जिन्हें ज्योतिष की सहायता के बिना समझा ही नहीं जा सकता,परन्तु यह सारा महत्व गणित ज्योतिष का है,फलित का नहीं।

यहाँ गणित और फलित ज्योतिष का अन्तर स्पष्ट करना आवश्यक है। गणित ज्योतिष वह विद्या है,जिसके द्वारा सूर्य,चन्द्र,नक्षत्र आदि से प्रकृति में होने वाली घटनाओं का यथार्थ ज्ञान हो। जैसे सूर्यग्रहण कब होगा,चन्द्रग्रहण कब होगा? दिन घटना कब आरम्भ होता है और बढ़ना कब आरम्भ होता है। गणित ज्योतिष से हम नक्षत्रों की स्थिति जानकर ऐतिहासिक घटनाओं का विज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं।। इस गणित ज्योतिष को आर्यसमाज मानता है।

फलित ज्योतिष क्या है? यदि जन्मलग्न में राहु हो और छठे स्थान में चन्द्रमा हो तो बालक की मृत्यु हो जाती है। यदि जन्मलग्न में शनि हो और छठे स्थान में चन्द्रमा हो तथा सातवें स्थान में मंगल हो तो बालक का पिता मर जाता है। जन्मलग्न में तीसरे स्थान में भौम हो तो जितने भाई हों सभी का नाश हो जाता है। इसी प्रकार यदि रात को बच्चा उत्पन्न होगा तो अमुक प्रकार का होगा। रविवार को होगा तो अमुक प्रकार का होगा। किसी कन्या का विवाह अमुक समय में हो गया तो वह विधवा हो जायेगी,आदि-आदि। यह है फलित ज्योतिष यह सर्वथा मिथ्या (झूठ) है। यह लोगों को ठगने का पाखण्ड़ है।

इन फलित ज्योतिष के अन्तर्गत ही हस्तरेखा भी है। यह भी मिथ्या है। अनेक लोग ज्योतिषियों को अपना हाथ दिखाकर अपने को अपने को ठगाते हैं।

आपके हाथ में क्या है? लीजिए एक शिक्षाप्रद घटना पढिए-

एक बार एक युवक महर्षि दयानन्द के पास गया और अपना हाथ आगे बढ़ाकर कहने लगा -“स्वामी जी!देखिये, मेरे हाथ में क्या है? “स्वामीजी ने उसके हाथ को देखते हुए कहा-“इसमें खून है, मांस है,चर्बी है,चाम है,हड्डियाँ हैं और क्या है?”

हमारे हाथ में क्या है? वेद कहता है-

*कृतं में दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।*
*गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनञ्जयो हिरण्यजित्।।-(अथर्व० ७/५०/८)*

मेरे दायें हाथ में कर्म है और बायें हाथ में विजय है। मैं अपने कर्मों के द्वारा गौ,भूमि,अश्व,धन और स्वर्ण का विजेता बनूँ।

यदि आप रेखाओं के भरोसे ही बैठे रहे तो कुछ नहीं होगा। कर्म द्वारा,प्रबल पुरुषार्थ द्वारा आप सारे संसार का शासन भी कर सकते हैं। अतः कर्म करो।
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता और विधाता स्वयं है। ज्योतिष के द्वारा आपके भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता। ज्योतिष आपको धन-सम्पत्ति नहीं दे सकते। महर्षि दयानन्द के इन वचनों को सदा स्मरण रखो-

“जो धनाढ्य,दरिद्र,प्रजा,राजा,रंक होते हैं,वे अपने कर्मों से होते हैं, ग्रहों से नहीं।”-

सत्यार्थप्रकाश ,एकादशसमुल्लासः

 

Ten Principles of Arya Samaj

When Maharishi Dayanand founded the Arya Samaj, he laid down the Ten Principles that govern Arya Samaj and which should be followed by every Arya Samajist in belief and practice.

 

    1. God is the origin and fountain head of all the truth and material knowledge prevalent in this world.
    2. God is truth-being and bliss, formless, all powerful, just, merciful, birth less, infinite, without a beginning, incomparable, base for everything, spread everywhere, all knowing, deathless, disease less, fearless, sacred and creator of the universe. Our devotion is due only to Him.
    3. The Veda is the book of all true knowledge. To read and understand the Veda is the supreme duty of all the Aryas.
    4. One should always be ready to accept what is truth and reject what is untruth.
    5. One should always act according to Dharma, that is, after deliberating over the truth or untruth of an act.
    6. The aim of Arya Samaj is to work for the well being of the whole word, physical, spiritual and social.
    7. One should treat everybody with love, respect and Dharma.
    8. One should work for the eradication of non-knowledge (Avidya) and spread of knowledge (Vidya).
    9. One should not be satisfied with one’s own progress but regard everyone’s progress as one’s own.

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